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ज्योतिष विज्ञानं

क्या ज्योतिष विज्ञानं है ?ज्योतिष के द्वारा हम व्यक्ति के पूर्व और भविष्य को तथा उसकी प्रकृति और उसके चरित्र को जानते है। ऐसा माना जाता है की जीव ने पूर्व जनम में जो कुछ भी कर्म किए है उसका फल इस जन्म में मिलना होता है। ज्योतिष उसकी प्रमाणिक सुचना ग्रह ,राशियो और नक्षत्र के माद्यम से देता है। क्योकि अनंतकाल से ग्रह अपनी कक्षा में घुम रहे है और इनके चुम्बकीय प्रभाव से हमको प्रभावित कर रहे है। आपके पिछले जन्म में भी इनकी रफ्तार वोंही थी जो आज इस जन्म में है। कोई भी जीव / वस्तु इनके प्रभाव से बच नही सकते चाहे वो अच्छा या बुरा हो। चंद्रमा ज्वार भाटे का कारक है , पृथ्वी का गुरुत्वाकर्सन , अन्य ग्रहों का अपने केन्द्र में घूमना प्रमाण है . और अगर कोई अनजानी शक्ति ये कर सकती है तो जरुर ही ये हमारे शरीर और मस्तिस्क को प्रभावित करती ही होगी। आप माने या न माने । ज्योतिष के माध्यम से हम जान सकते है की कौन से ग्रह है जो की आपको प्रभावित कर रहे है? जिस समय आपका जन्म होता है उस समय जो ग्रह जिस स्तिथी और कोण में है उसी से इसका पता एक अच्छा ज्योतिष कर् सकता है। इसीलिए सही जन्म तारीख जन्म समय और जन्म स्थान का पता जरुर होनी चाहिए तभी आपके सही ग्रहों की स्तिथि का पता किया जा सकता है।

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हस्त रेखा विज्ञानं

 

image Principles of Palmistry

गर्भावस्था के दौरान ही शिशु के हाथ में लकीरो का जाल बुन जाता है, जो कि जन्म से लेकर मृत्यु तक रेखाओ के रुप में विद्यमान रहता है। इसे हस्त रेखा (Palm line) के रुप में जाना जाता है। सामान्यतया 16 वर्ष तक की आयु के बच्चो की हाथों की रेखाओ में परिवर्तन होता रहता है।

सोलह वर्ष की आयु होने पर मुख्य रेखाएँ (जीवन रेखा, भाग्य रेखा इत्यादि) (Life line, Fortune line) स्थिर हो जाती है तथा कर्मो के अनुसार अन्य छोटे-बडे परिवर्तन होते रहते हैं। तथा ये परिवर्तन जीवन के अंतिम क्षण तक होते रहते हैं (Life line keep on changing throughout life)।
चूंकि हस्त रेखा (Samudrik Shastra)
विज्ञान कर्मो के आधार पर टिका है, इसलिए मनुष्य जैसे कर्म करता है वैसा ही परिवर्तन उसके हाथ की रेखाओ में हो जाता है (Palmistry stand by our work, palm line change with them)। हाथ का विश्लेषण करते समय सबसे पहले हम हाथ की बनावट को देखते हैं तत्पश्चात यह देखा जाता है कि हाथ मुलायम है या सख्त।आम तौर पर पुरुषो का दायाँ हाथ तथा स्त्रियों का बायाँ हाथ देखा जाता है।यदि कोइ पुरुष बायें हाथ से काम करता है तो उसका बायाँ हाथ देखा जाता है। हाथ में जितनी कम रेखाऎं होती हैं, भाग्य की दृष्टि से हाथ उतना ही सुन्दर माना जाता है (Lots of Palm line are not good for Fortune)।

हाथ में मुख्यतः चार रेखाओ का उभार स्पष्ट रुप से रहता है( We can see four main line in palm)
जीवन रेखा (Life Line)
जीवन रेखा हृदय रेखा के ऊपरी भाग से शुरु होकर आमतौर पर मणिबन्ध पर जाकर समाप्त हो जाती है (Life line start from heart line and end on Manibandh line)। यह रेखा भाग्य रेखा के समानान्तर चलती है, परन्तु कुछ व्यक्तियो की हथेली में जीवन रेखा हृदय रेखा में से निकलकर भाग्य रेखा में किसी भी बिन्दु पर मिल जाती है।जीवन रेखा तभी उत्तम मानी जाती है यदि उसे कोइ अन्य रेखा न काट रही हो तथा वह लम्बी हो इसका अर्थ है कि व्यक्ति की आयु लम्बी होगी तथा अधिकतर जीवन सुखमय बीतेगा। रेखा छोटी तथा कटी होने पर आयु कम एंव जीवन संघर्षमय होगा(If there is breakage in life line or there is any cut it means your life is short and in struggle)

भाग्य रेखा:(Fate Line)
हृदय रेखा के मध्य से शुरु होकर मणिबन्ध तक जाने वाली सीधी रेखा को भाग्य रेखा कहते हैं (Straight Line start from middle of heart and end on Manibandh line called fate line) ।स्पष्ट रुप से दिखाई देने वाली रेखा उत्तम भाग्य का घौतक है।यदि भाग्य रेखा को कोइ अन्य रेखा न काटती हो तो भाग्य में किसी प्रकार की रुकावट नही आती।परन्तु यदि जिस बिन्दु पर रेखा भाग्य को काटती है तो उसी वर्ष व्यक्ति को भाग्य की हानि होती है।कुछ लोगो के हाथ में जीवन रेखा एंव भाग्य रेखा में से एक ही रेखा होती है।इस स्थिति में वह व्यक्ति आसाधारण होता है, या तो एकदम भाग्यहीन या फिर उच्चस्तर का भाग्यशाली होता है (If there is no fortune line on your palm it means you are not a middle class)। ऎसा व्यक्ति मध्यम स्तर का जीवन कभी नहीं जीता है।

हृदय रेखा: (Heart Line)
हथेली के मध्य में एक भाग से लेकर दूसरे भाग तक लेटी हुई रेखा को हृदय रेखा कहते हैं (Vertical line starts from middle of palm and end on heart line called heart line)। यदि हृदय रेखा एकदम सीधी या थोडा सा घुमाव लेकर जाती है तो वह व्यक्ति को निष्कपट बनाती है। यदि हृदय रेखा लहराती हुई चलती है तो वह व्यक्ति हृदय से पीडित रहता है।यदि रेखा टूटी हुई हो या उस पर कोइ निशान हो तो व्यक्ति को हृदयाघात हो सकता है(There is Chance of heart attack if heart line is break)।

मस्तिष्क  रेखा:(Brain Line)
हथेली के एक छोर से दूसरे छोर तक उंगलियो के पर्वतो तथा हृदय रेखा के समानान्तर जाने वाली रेखा को मस्तिष्क रेखा  कहते हैं (Parallel line to heart line is called mind line)। यह आवश्यक नहीं कि मस्तिष्क रेखा एक छोर से दूसरे छोर तक (हथेली) जायें, यह बीच में ही किसी भी पर्वत (Planetary Mounts) की ओर मुड सकती है। यदि हृदय रेखा और मस्तिष्क रेखा आपस में न मिलें तो उत्तम रहता है (Brain line is good if mind line or heart line are not together)। स्पष्ट एंव बाधा रहित रेखा उत्तम मानी जाती है। कई बार मस्तिष्क रेखा एक छोर पर दो भागों में विभाजित हो जाती है। ऎसी रेखा वाला व्यक्ति स्थिर स्वभाव का नहीं होता है, सदा भ्रमित रहता है।

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वास्तु विज्ञानं

वास्तु धरती, जल, अग्नि, वायु और आकाश सहित प्रकृति की बहुत सी शक्तियों के आपसी सम्बन्धो को मानती है और उनमे संतुलन बनाये रखने पर जोर डालती है जिनका प्रभाव, मार्ग दर्शन ना केवल मनुष्य बल्कि इस धरती के हर प्राणी की जीवन शैली में परिवर्तन लाता है| इस तरह ये हमारी जरूरतों, भाग्य, व्यवहार और जीवन के अन्य क्षेत्रो को प्रभावित करते है|

वास्तु आपके आस-पास की चीजों और उनका आपकी ज़िन्दगी में प्रभाव का उत्तम स्पष्टीकरण हैं | वास्तु, वास्तव में, एक घर और उसके आधारभूत स्तंभों में और वातावरण में पाँचों तत्वों (धरती, जल, अग्नि, वायु, आकाश) में सामंजस्य स्थापित करे |

वास्तु शास्त्र विज्ञान, खगोल शास्त्र और ज्योतिष शास्त्र का जोड़ है | आप इसे संरचना और निर्माण का प्राचीन गूढ़ विज्ञान हैं | वास्तु हमें बेहतर जीवन जीने और बुरी चीजों से बचने में मदद करता हैं |

वास्तु शास्त्र एक प्राचीन निर्माण विज्ञान हैं जिसमें किसी ईमारत के वस्तुशिल्पिय निर्माण के सिद्धांत और ज्ञान विद्या को शामिल किया जाता हैं | वास्तु शास्त्र प्रकृति की विभिन्न उर्जाओं पर आधारित हैं :

सूर्य से सौर उर्जा, चंद्रमा से चन्द्र उर्जा
थल उर्जा
नभ उर्जा
विधुत उर्जा
चुम्बकीय उर्जा
उष्ण ऊर्जा
पवन ऊर्जा
प्रकाश ऊर्जा अन्तरिक्ष ऊर्जा

इन सभी ऊर्जाओं का अधिकतम उपयोग हमारे जीवन में शांति, धन, दौलत, वैभव, लाता है| वर्तमान में हमे भवन निर्माण कूट और नियमो का पालन करना पड़ता है, जबकि पहले हमारे पूर्वज वास्तु शास्त्र को धार्मिक व प्रमुख कूट की तरह काम में लेते थे| शास्त्रों के अनुसार “वास्तु पुरुष” निर्माण विज्ञानं के देवता है तो आये उनकी पूजा करे| वास्तु न्यायसंगत है, क्योंकि यह विज्ञानं आधारित है, अपरिवर्तनीय है क्योंकि यह दिशाओ पर आधारित है और दिशाये अपरिवर्तनीय होती है| यह फायदेमंद है, क्योंकि यह मानव, सामग्री और प्रकर्ति के बीच एक पुल है और इन सबसे ज्यादा यह व्यावहारिक है इसे पूरा करना आसान है| अपने घर का निर्माण वास्तु के मार्गदर्शन में करे और अपनी ज़िन्दगी को ख़ुशी और धन – धान्य की ओर अग्रसित करे |

वास्तु को हरेक घर, कक्ष, हरेक मंदिर, हर दुकान, नगर नियोजन, शहर के लिए उपयोग में लाया जाना चाहिए और धरती के लिए भी और छोटे से लेकर बड़े स्तर तक काम में लिया जाना चाहिये |

इस धरती पर हर इंसान की ज़िन्दगी सूर्योदय से शुरू होती है जो दिन रात चलती हैं | इस तरह हर एक की ज़िन्दगी में सूर्य का बड़ा महत्व हैं | यह हमें सुबह पराबैंगनी किरणे तथा शाम को अवरक्त किरणे देता हैं जोकि धरती पर जैव रासायनिक किटाणु, नाइट्रोजन, आक्सीजन, कार्बन डाई ऑक्साइड को बडाने/घटाने में जरुरी हैं |

सुर्य प्रकाश को प्रकट , उदारता , सौर प्रणाली , भाग्य , श्रम गतिशीलता को बताता है| यह हमारे अस्थीयों, आँख, दिल, मेरु-दंड ,रक्त संचार और आत्मा को नियंत्रित करता है| इसलिए पूर्व दिशा शुभ है | यह इन्द्र भगवान से सम्बंधित है | चुम्बकीय रेखाये उत्तर से दक्षिण की और चलती है इसलिए उत्तर दिशा भी शुभ मानी गयी है | इस वजह से यह हर ज़िन्दगी का मूल हैं |

धरती, जल, अग्नि, वायु और प्रकाश में सामंजस्य बनाने के लिए तीन शक्तिया काम करती हैं और ये शक्तिया सही जगह रखी जाये तो कोई अशांति नहीं होती हैं | लेकिन यदि जल अग्नि की जगह या अन्य गलत संयोजन होने पर शक्तिया उसी तरह से काम करके असामंजस्यता और अशांति पैदा करती हैं |

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रत्न विज्ञानं

रत्न क्यों तथा कब पहनना चाहिए

विज्ञान और हम सब यह मानते हैं की सृष्टि तथा मानव शरीर पंच तत्वों के मिश्रण से बना है- अग्नि, पृथ्वी, वायु, आकाश एवं जल। विधिवत सृष्टि संचालन तथा मानव शरीर संचालन के लिए इन तत्वों का संतुलन परम आवश्यक है। इन तत्वों के संतुलित रहने पर जिस प्रकार सृष्टि प्रसन्न रहती है उसी प्रकार, मनुष्य प्रसन्न तथा स्वस्थ रहता है। इन्हीं तत्वों के असंतुलित होने पर जिस प्रकार ज्वार-भाटा और अन्य प्राकृतिक आपदाएं आती हैं उसी प्रकार मनुष्य रोगग्रस्त, चिड़चिड़ा, दुखों से पीड़ित एवं कांतिहीन हो जाता है।किसी भी एक तत्त्व की न्यूनता तथा अधिकता दोनों ही ख़राब है। और इन तत्वों को संतुलित करने का आधार है ऊर्जा, प्रकाश और रंग। रत्न भी इसी सिद्धांत पर काम करता है।

रत्न करता क्या है
रत्न खुद किसी प्रकाश अथवा ऊर्जा का श्रोत नहीं होता अपितु अपनी संरचना, बनावट, अपने रंग, स्वभाव के अनुसार विशेष प्रकार की ऊर्जा/कंपनशक्ति/चुम्बकीय शक्ति को खींचता है और और उसको अवशोषित (Absorb), परावर्तित (Reflect) अथवा प्रसारित (Transmit) करता है।

रत्न की चमक इसकी सतह से परावर्तित प्रकाश की मात्रा (Quantity) और गुणवत्ता (Quality) के कारण होती है। रत्न का रंग इस बात पर निर्भर करता है की उनसे किस wavelength का प्रकाश अवशोषित तथा परावर्तित किया है। विज्ञानं इसको चयनात्मक अवशोषण (Selective Absorption) कहता है।

रत्न अगर किसी ऐसी चीज़ से स्पर्श करे जो उर्जा का चालाक हो तो उर्जा/कंपनशक्ति/चुम्बकीय शक्ति/प्रकाश प्रसारित कर देता है। यही कारण है की ज्योतिषी कहते हैं की रत्न ऊँगली/शरीर से स्पर्श होना चाहिए।

वैसे तो इस ब्रह्माण्ड की प्रत्येक वस्तु ऊर्जा को अवशोषित/परावर्तित करता है। परन्तु रत्न जिस विशेष प्रकार की ऊर्जा को खींचता है वो है ग्रहों की ऊर्जा, सूर्य के प्रकाश में निहित ग्रहों की विशेष रश्मियाँ, ग्रह की चुम्बकीय शक्ति, ग्रहों की विशेष कम्पन शक्ति।

अब आप ये तो समझ गए की रत्न ग्रह से सम्बंधित ऊर्जा को बड़ा देता है परन्तु खुद रत्न में इतना दिमाग नहीं है की वो ऊर्जा आपको सकारात्मक प्रभाव देगी या नकारात्मक। यह आपको और आपके ज्योतिषी को पता लगाना होगा। अगर वो ग्रह आपकी कुंडली का अकारक/अनिष्ट ग्रह है तो नकारात्मक ऊर्जा बढ़ जायेगी और आपको विपरीत परिणाम ही मिलेंगे। अथवा अगर आपके शरीर में पहले से ही अग्नितत्व की अधिकता के कारण कोई रोग है और आपने अग्नितत्व का ही रत्न पहन लिया तो रोग और ज्यादा बढ़ सकता है।

किस ग्रह का रत्न आप पहन सकते हैं
सामान्यत: लग्न कुंडली के अनुसार योगकारक ग्रह (जो ग्रह केंद्र तथा त्रिकोण दोनों का स्वामी हो). कारक ग्रहों के (1, 5, 9 भाव स्वामी) रत्न पहने जा सकते हैं। परन्तु यह बहुत सामान्य नीयम है और इसका यह मतलब नहीं की अगर जरूरत न हो फिर भी योगकारक और कारक ग्रह का रत्न पहनना चाहिए।

रत्न कब और क्यों पहनना चाहिए
एक सच्चा ज्योतिषी रत्न पहनने की सलाह देता है अगर:

लग्न कुंडली के किसी कारक ग्रह का बल बहुत कम है। किसी भी ग्रह का बल ६ तरीके का होता है स्थान बल, दिग्बल, काल बल, चेष्टा बल, नैसर्गिक बल, द्रिक बल जिसको षड्बल कहते हैं। अगर षड्बल में ग्रह कमजोर है और न्यूनतम आवश्यकता से कम बल प्राप्त है तो यह तो निश्चित है की उसको बल देने की जरूरत है।
परन्तु षड्बल के साथ साथ यह भी देखना जरूरी है की ग्रह किस भाव में किस अन्य ग्रह के साथ बैठकर कैसा फल दे रहा है। मान लीजिये आपका कारक ग्रह मंगल अष्टम में बैठकर किसी अनिष्ट की सम्भावना बना रहा है और षड्बल में कमजोर है तो अगर आपने मंगल को और मजबूत कर दिया तो अनिष्ट होना निश्चित ही मानिए।
ग्रह अपनी महादशा/अन्तर्दशा में ज्यादा प्रभाव डालता है अतः अगर वो कारक ग्रह है तथा कमजोर है तो उसका रत्न पहनें। ग्रह गोचर के अनुसार भी रत्न पहना जा सकता है।

किस ग्रह का रत्न आपको नहीं पहनना चाहिए

सामान्यतः 3, 6, 8, 12 भाव के स्वामी ग्रहों के रत्न नहीं पहनने चाहिए जब तक की वो खुद लग्नेश/भाग्येश न हो।
अष्टमेश अगर लग्नेश न हो तो उसका रत्न कभी भी न पहनें (अगर किसी विशेष परिस्तिथि में जरूरत पड़े तो यह जांच लें की अष्टम भाव में उसकी मूल त्रिकोण राशि न पड़े)। और भी अन्य तरीके हैं ग्रहों की सकारात्मक उर्जा को बढ़ाने की।
ऐसे ग्रह का रत्न न पहनें जो लग्नेश का शत्रु हो।
बाधक, मारक, केन्द्राधिपत्य दोष से दूषित, मारक स्थान में गए ग्रह का रत्न पहनने से बचें।
अगर ऐसे ग्रह का रत्न पहनने की जरूरत पड़े जो 6, 8, 12 भाव में बैठा है तो अच्छा रहेगा साथ में उसी ग्रह का यंत्र जोड़ दें और गले में धारण करें।

रत्न पहनने का तरीका
अगर यह सुनिश्चित कर लिया है की आपको रत्न पहनना है तो वह रत्न किस उंगली में, किस धातु में, किस दिन, किस समय, किस ग्रह की होरा में, किस मंत्रोचारण के साथ पहनना है यह भी ज्योतिषी से जरूर पता कर लें। रत्न को पहनने से पहले इष्ट देव, ग्रह से सम्बंधित देवता का पूजन अनिवार्य है। मैं इस बारे में अलग से ब्लॉग पोस्ट लिखूंगा।

रत्नों के बारे में भ्रांतियां

अगर कोई भी मांगलिक हो तो मूंगा पहन ले
अगर गुस्सा आता है तो मोती पहन लो
अगर किसी की शादी नहीं हो रही तो पुखराज/ओपल/जरकिन पहन ले
अगर किसी के संतान नहीं तो उसकी पत्नी को पुखराज पहना दो
पन्ना धारण करने से परीक्षा में सफलता मिल जायेगी।
गुरु पुत्र, धन कारक ग्रह है अतः पुखराज कोई भी पहन सकता है
लग्न कुंडली में कोई भी ग्रह नीच का है तो उसका रत्न पहन लो
अगर राहु की महादशा चल रही है तो गोमेद पहन लो
जिस भी ग्रह की महादशा चल रही है उसका रत्न जरूर पहनना चाहिए
अगर ग्रह अस्त है तो उसका रत्न पहन लो चाहे षड्बल में उसको सर्वोच्च स्थान ही क्यों न प्राप्त हो।
रत्न ग्रह की शान्ति करता है।