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हस्त रेखा विज्ञानं

 

image Principles of Palmistry

गर्भावस्था के दौरान ही शिशु के हाथ में लकीरो का जाल बुन जाता है, जो कि जन्म से लेकर मृत्यु तक रेखाओ के रुप में विद्यमान रहता है। इसे हस्त रेखा (Palm line) के रुप में जाना जाता है। सामान्यतया 16 वर्ष तक की आयु के बच्चो की हाथों की रेखाओ में परिवर्तन होता रहता है।

सोलह वर्ष की आयु होने पर मुख्य रेखाएँ (जीवन रेखा, भाग्य रेखा इत्यादि) (Life line, Fortune line) स्थिर हो जाती है तथा कर्मो के अनुसार अन्य छोटे-बडे परिवर्तन होते रहते हैं। तथा ये परिवर्तन जीवन के अंतिम क्षण तक होते रहते हैं (Life line keep on changing throughout life)।
चूंकि हस्त रेखा (Samudrik Shastra)
विज्ञान कर्मो के आधार पर टिका है, इसलिए मनुष्य जैसे कर्म करता है वैसा ही परिवर्तन उसके हाथ की रेखाओ में हो जाता है (Palmistry stand by our work, palm line change with them)। हाथ का विश्लेषण करते समय सबसे पहले हम हाथ की बनावट को देखते हैं तत्पश्चात यह देखा जाता है कि हाथ मुलायम है या सख्त।आम तौर पर पुरुषो का दायाँ हाथ तथा स्त्रियों का बायाँ हाथ देखा जाता है।यदि कोइ पुरुष बायें हाथ से काम करता है तो उसका बायाँ हाथ देखा जाता है। हाथ में जितनी कम रेखाऎं होती हैं, भाग्य की दृष्टि से हाथ उतना ही सुन्दर माना जाता है (Lots of Palm line are not good for Fortune)।

हाथ में मुख्यतः चार रेखाओ का उभार स्पष्ट रुप से रहता है( We can see four main line in palm)
जीवन रेखा (Life Line)
जीवन रेखा हृदय रेखा के ऊपरी भाग से शुरु होकर आमतौर पर मणिबन्ध पर जाकर समाप्त हो जाती है (Life line start from heart line and end on Manibandh line)। यह रेखा भाग्य रेखा के समानान्तर चलती है, परन्तु कुछ व्यक्तियो की हथेली में जीवन रेखा हृदय रेखा में से निकलकर भाग्य रेखा में किसी भी बिन्दु पर मिल जाती है।जीवन रेखा तभी उत्तम मानी जाती है यदि उसे कोइ अन्य रेखा न काट रही हो तथा वह लम्बी हो इसका अर्थ है कि व्यक्ति की आयु लम्बी होगी तथा अधिकतर जीवन सुखमय बीतेगा। रेखा छोटी तथा कटी होने पर आयु कम एंव जीवन संघर्षमय होगा(If there is breakage in life line or there is any cut it means your life is short and in struggle)

भाग्य रेखा:(Fate Line)
हृदय रेखा के मध्य से शुरु होकर मणिबन्ध तक जाने वाली सीधी रेखा को भाग्य रेखा कहते हैं (Straight Line start from middle of heart and end on Manibandh line called fate line) ।स्पष्ट रुप से दिखाई देने वाली रेखा उत्तम भाग्य का घौतक है।यदि भाग्य रेखा को कोइ अन्य रेखा न काटती हो तो भाग्य में किसी प्रकार की रुकावट नही आती।परन्तु यदि जिस बिन्दु पर रेखा भाग्य को काटती है तो उसी वर्ष व्यक्ति को भाग्य की हानि होती है।कुछ लोगो के हाथ में जीवन रेखा एंव भाग्य रेखा में से एक ही रेखा होती है।इस स्थिति में वह व्यक्ति आसाधारण होता है, या तो एकदम भाग्यहीन या फिर उच्चस्तर का भाग्यशाली होता है (If there is no fortune line on your palm it means you are not a middle class)। ऎसा व्यक्ति मध्यम स्तर का जीवन कभी नहीं जीता है।

हृदय रेखा: (Heart Line)
हथेली के मध्य में एक भाग से लेकर दूसरे भाग तक लेटी हुई रेखा को हृदय रेखा कहते हैं (Vertical line starts from middle of palm and end on heart line called heart line)। यदि हृदय रेखा एकदम सीधी या थोडा सा घुमाव लेकर जाती है तो वह व्यक्ति को निष्कपट बनाती है। यदि हृदय रेखा लहराती हुई चलती है तो वह व्यक्ति हृदय से पीडित रहता है।यदि रेखा टूटी हुई हो या उस पर कोइ निशान हो तो व्यक्ति को हृदयाघात हो सकता है(There is Chance of heart attack if heart line is break)।

मस्तिष्क  रेखा:(Brain Line)
हथेली के एक छोर से दूसरे छोर तक उंगलियो के पर्वतो तथा हृदय रेखा के समानान्तर जाने वाली रेखा को मस्तिष्क रेखा  कहते हैं (Parallel line to heart line is called mind line)। यह आवश्यक नहीं कि मस्तिष्क रेखा एक छोर से दूसरे छोर तक (हथेली) जायें, यह बीच में ही किसी भी पर्वत (Planetary Mounts) की ओर मुड सकती है। यदि हृदय रेखा और मस्तिष्क रेखा आपस में न मिलें तो उत्तम रहता है (Brain line is good if mind line or heart line are not together)। स्पष्ट एंव बाधा रहित रेखा उत्तम मानी जाती है। कई बार मस्तिष्क रेखा एक छोर पर दो भागों में विभाजित हो जाती है। ऎसी रेखा वाला व्यक्ति स्थिर स्वभाव का नहीं होता है, सदा भ्रमित रहता है।

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वास्तु विज्ञानं

वास्तु धरती, जल, अग्नि, वायु और आकाश सहित प्रकृति की बहुत सी शक्तियों के आपसी सम्बन्धो को मानती है और उनमे संतुलन बनाये रखने पर जोर डालती है जिनका प्रभाव, मार्ग दर्शन ना केवल मनुष्य बल्कि इस धरती के हर प्राणी की जीवन शैली में परिवर्तन लाता है| इस तरह ये हमारी जरूरतों, भाग्य, व्यवहार और जीवन के अन्य क्षेत्रो को प्रभावित करते है|

वास्तु आपके आस-पास की चीजों और उनका आपकी ज़िन्दगी में प्रभाव का उत्तम स्पष्टीकरण हैं | वास्तु, वास्तव में, एक घर और उसके आधारभूत स्तंभों में और वातावरण में पाँचों तत्वों (धरती, जल, अग्नि, वायु, आकाश) में सामंजस्य स्थापित करे |

वास्तु शास्त्र विज्ञान, खगोल शास्त्र और ज्योतिष शास्त्र का जोड़ है | आप इसे संरचना और निर्माण का प्राचीन गूढ़ विज्ञान हैं | वास्तु हमें बेहतर जीवन जीने और बुरी चीजों से बचने में मदद करता हैं |

वास्तु शास्त्र एक प्राचीन निर्माण विज्ञान हैं जिसमें किसी ईमारत के वस्तुशिल्पिय निर्माण के सिद्धांत और ज्ञान विद्या को शामिल किया जाता हैं | वास्तु शास्त्र प्रकृति की विभिन्न उर्जाओं पर आधारित हैं :

सूर्य से सौर उर्जा, चंद्रमा से चन्द्र उर्जा
थल उर्जा
नभ उर्जा
विधुत उर्जा
चुम्बकीय उर्जा
उष्ण ऊर्जा
पवन ऊर्जा
प्रकाश ऊर्जा अन्तरिक्ष ऊर्जा

इन सभी ऊर्जाओं का अधिकतम उपयोग हमारे जीवन में शांति, धन, दौलत, वैभव, लाता है| वर्तमान में हमे भवन निर्माण कूट और नियमो का पालन करना पड़ता है, जबकि पहले हमारे पूर्वज वास्तु शास्त्र को धार्मिक व प्रमुख कूट की तरह काम में लेते थे| शास्त्रों के अनुसार “वास्तु पुरुष” निर्माण विज्ञानं के देवता है तो आये उनकी पूजा करे| वास्तु न्यायसंगत है, क्योंकि यह विज्ञानं आधारित है, अपरिवर्तनीय है क्योंकि यह दिशाओ पर आधारित है और दिशाये अपरिवर्तनीय होती है| यह फायदेमंद है, क्योंकि यह मानव, सामग्री और प्रकर्ति के बीच एक पुल है और इन सबसे ज्यादा यह व्यावहारिक है इसे पूरा करना आसान है| अपने घर का निर्माण वास्तु के मार्गदर्शन में करे और अपनी ज़िन्दगी को ख़ुशी और धन – धान्य की ओर अग्रसित करे |

वास्तु को हरेक घर, कक्ष, हरेक मंदिर, हर दुकान, नगर नियोजन, शहर के लिए उपयोग में लाया जाना चाहिए और धरती के लिए भी और छोटे से लेकर बड़े स्तर तक काम में लिया जाना चाहिये |

इस धरती पर हर इंसान की ज़िन्दगी सूर्योदय से शुरू होती है जो दिन रात चलती हैं | इस तरह हर एक की ज़िन्दगी में सूर्य का बड़ा महत्व हैं | यह हमें सुबह पराबैंगनी किरणे तथा शाम को अवरक्त किरणे देता हैं जोकि धरती पर जैव रासायनिक किटाणु, नाइट्रोजन, आक्सीजन, कार्बन डाई ऑक्साइड को बडाने/घटाने में जरुरी हैं |

सुर्य प्रकाश को प्रकट , उदारता , सौर प्रणाली , भाग्य , श्रम गतिशीलता को बताता है| यह हमारे अस्थीयों, आँख, दिल, मेरु-दंड ,रक्त संचार और आत्मा को नियंत्रित करता है| इसलिए पूर्व दिशा शुभ है | यह इन्द्र भगवान से सम्बंधित है | चुम्बकीय रेखाये उत्तर से दक्षिण की और चलती है इसलिए उत्तर दिशा भी शुभ मानी गयी है | इस वजह से यह हर ज़िन्दगी का मूल हैं |

धरती, जल, अग्नि, वायु और प्रकाश में सामंजस्य बनाने के लिए तीन शक्तिया काम करती हैं और ये शक्तिया सही जगह रखी जाये तो कोई अशांति नहीं होती हैं | लेकिन यदि जल अग्नि की जगह या अन्य गलत संयोजन होने पर शक्तिया उसी तरह से काम करके असामंजस्यता और अशांति पैदा करती हैं |

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रत्न विज्ञानं

रत्न क्यों तथा कब पहनना चाहिए

विज्ञान और हम सब यह मानते हैं की सृष्टि तथा मानव शरीर पंच तत्वों के मिश्रण से बना है- अग्नि, पृथ्वी, वायु, आकाश एवं जल। विधिवत सृष्टि संचालन तथा मानव शरीर संचालन के लिए इन तत्वों का संतुलन परम आवश्यक है। इन तत्वों के संतुलित रहने पर जिस प्रकार सृष्टि प्रसन्न रहती है उसी प्रकार, मनुष्य प्रसन्न तथा स्वस्थ रहता है। इन्हीं तत्वों के असंतुलित होने पर जिस प्रकार ज्वार-भाटा और अन्य प्राकृतिक आपदाएं आती हैं उसी प्रकार मनुष्य रोगग्रस्त, चिड़चिड़ा, दुखों से पीड़ित एवं कांतिहीन हो जाता है।किसी भी एक तत्त्व की न्यूनता तथा अधिकता दोनों ही ख़राब है। और इन तत्वों को संतुलित करने का आधार है ऊर्जा, प्रकाश और रंग। रत्न भी इसी सिद्धांत पर काम करता है।

रत्न करता क्या है
रत्न खुद किसी प्रकाश अथवा ऊर्जा का श्रोत नहीं होता अपितु अपनी संरचना, बनावट, अपने रंग, स्वभाव के अनुसार विशेष प्रकार की ऊर्जा/कंपनशक्ति/चुम्बकीय शक्ति को खींचता है और और उसको अवशोषित (Absorb), परावर्तित (Reflect) अथवा प्रसारित (Transmit) करता है।

रत्न की चमक इसकी सतह से परावर्तित प्रकाश की मात्रा (Quantity) और गुणवत्ता (Quality) के कारण होती है। रत्न का रंग इस बात पर निर्भर करता है की उनसे किस wavelength का प्रकाश अवशोषित तथा परावर्तित किया है। विज्ञानं इसको चयनात्मक अवशोषण (Selective Absorption) कहता है।

रत्न अगर किसी ऐसी चीज़ से स्पर्श करे जो उर्जा का चालाक हो तो उर्जा/कंपनशक्ति/चुम्बकीय शक्ति/प्रकाश प्रसारित कर देता है। यही कारण है की ज्योतिषी कहते हैं की रत्न ऊँगली/शरीर से स्पर्श होना चाहिए।

वैसे तो इस ब्रह्माण्ड की प्रत्येक वस्तु ऊर्जा को अवशोषित/परावर्तित करता है। परन्तु रत्न जिस विशेष प्रकार की ऊर्जा को खींचता है वो है ग्रहों की ऊर्जा, सूर्य के प्रकाश में निहित ग्रहों की विशेष रश्मियाँ, ग्रह की चुम्बकीय शक्ति, ग्रहों की विशेष कम्पन शक्ति।

अब आप ये तो समझ गए की रत्न ग्रह से सम्बंधित ऊर्जा को बड़ा देता है परन्तु खुद रत्न में इतना दिमाग नहीं है की वो ऊर्जा आपको सकारात्मक प्रभाव देगी या नकारात्मक। यह आपको और आपके ज्योतिषी को पता लगाना होगा। अगर वो ग्रह आपकी कुंडली का अकारक/अनिष्ट ग्रह है तो नकारात्मक ऊर्जा बढ़ जायेगी और आपको विपरीत परिणाम ही मिलेंगे। अथवा अगर आपके शरीर में पहले से ही अग्नितत्व की अधिकता के कारण कोई रोग है और आपने अग्नितत्व का ही रत्न पहन लिया तो रोग और ज्यादा बढ़ सकता है।

किस ग्रह का रत्न आप पहन सकते हैं
सामान्यत: लग्न कुंडली के अनुसार योगकारक ग्रह (जो ग्रह केंद्र तथा त्रिकोण दोनों का स्वामी हो). कारक ग्रहों के (1, 5, 9 भाव स्वामी) रत्न पहने जा सकते हैं। परन्तु यह बहुत सामान्य नीयम है और इसका यह मतलब नहीं की अगर जरूरत न हो फिर भी योगकारक और कारक ग्रह का रत्न पहनना चाहिए।

रत्न कब और क्यों पहनना चाहिए
एक सच्चा ज्योतिषी रत्न पहनने की सलाह देता है अगर:

लग्न कुंडली के किसी कारक ग्रह का बल बहुत कम है। किसी भी ग्रह का बल ६ तरीके का होता है स्थान बल, दिग्बल, काल बल, चेष्टा बल, नैसर्गिक बल, द्रिक बल जिसको षड्बल कहते हैं। अगर षड्बल में ग्रह कमजोर है और न्यूनतम आवश्यकता से कम बल प्राप्त है तो यह तो निश्चित है की उसको बल देने की जरूरत है।
परन्तु षड्बल के साथ साथ यह भी देखना जरूरी है की ग्रह किस भाव में किस अन्य ग्रह के साथ बैठकर कैसा फल दे रहा है। मान लीजिये आपका कारक ग्रह मंगल अष्टम में बैठकर किसी अनिष्ट की सम्भावना बना रहा है और षड्बल में कमजोर है तो अगर आपने मंगल को और मजबूत कर दिया तो अनिष्ट होना निश्चित ही मानिए।
ग्रह अपनी महादशा/अन्तर्दशा में ज्यादा प्रभाव डालता है अतः अगर वो कारक ग्रह है तथा कमजोर है तो उसका रत्न पहनें। ग्रह गोचर के अनुसार भी रत्न पहना जा सकता है।

किस ग्रह का रत्न आपको नहीं पहनना चाहिए

सामान्यतः 3, 6, 8, 12 भाव के स्वामी ग्रहों के रत्न नहीं पहनने चाहिए जब तक की वो खुद लग्नेश/भाग्येश न हो।
अष्टमेश अगर लग्नेश न हो तो उसका रत्न कभी भी न पहनें (अगर किसी विशेष परिस्तिथि में जरूरत पड़े तो यह जांच लें की अष्टम भाव में उसकी मूल त्रिकोण राशि न पड़े)। और भी अन्य तरीके हैं ग्रहों की सकारात्मक उर्जा को बढ़ाने की।
ऐसे ग्रह का रत्न न पहनें जो लग्नेश का शत्रु हो।
बाधक, मारक, केन्द्राधिपत्य दोष से दूषित, मारक स्थान में गए ग्रह का रत्न पहनने से बचें।
अगर ऐसे ग्रह का रत्न पहनने की जरूरत पड़े जो 6, 8, 12 भाव में बैठा है तो अच्छा रहेगा साथ में उसी ग्रह का यंत्र जोड़ दें और गले में धारण करें।

रत्न पहनने का तरीका
अगर यह सुनिश्चित कर लिया है की आपको रत्न पहनना है तो वह रत्न किस उंगली में, किस धातु में, किस दिन, किस समय, किस ग्रह की होरा में, किस मंत्रोचारण के साथ पहनना है यह भी ज्योतिषी से जरूर पता कर लें। रत्न को पहनने से पहले इष्ट देव, ग्रह से सम्बंधित देवता का पूजन अनिवार्य है। मैं इस बारे में अलग से ब्लॉग पोस्ट लिखूंगा।

रत्नों के बारे में भ्रांतियां

अगर कोई भी मांगलिक हो तो मूंगा पहन ले
अगर गुस्सा आता है तो मोती पहन लो
अगर किसी की शादी नहीं हो रही तो पुखराज/ओपल/जरकिन पहन ले
अगर किसी के संतान नहीं तो उसकी पत्नी को पुखराज पहना दो
पन्ना धारण करने से परीक्षा में सफलता मिल जायेगी।
गुरु पुत्र, धन कारक ग्रह है अतः पुखराज कोई भी पहन सकता है
लग्न कुंडली में कोई भी ग्रह नीच का है तो उसका रत्न पहन लो
अगर राहु की महादशा चल रही है तो गोमेद पहन लो
जिस भी ग्रह की महादशा चल रही है उसका रत्न जरूर पहनना चाहिए
अगर ग्रह अस्त है तो उसका रत्न पहन लो चाहे षड्बल में उसको सर्वोच्च स्थान ही क्यों न प्राप्त हो।
रत्न ग्रह की शान्ति करता है।

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Law of unconditional love

The expression of unconditional love will eventually result in harmony. Unconditional love is not romantic love. It is the acceptance of others as they are without judgment or expectations. It is total acceptance of others without attempting to change them, except by our own positive example. The law of unconditional love says, “If you go out of your way to express unconditional love, you automatically rise above fear, and, as you transcend your fears, you automatically open to the expression of unconditional love.
What you see in others is what exists in you. It is a reflection, a mirror, if you will, of what you are and what still exists within you. For you cannot judge it, if it does not exist within you.

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Law of reincarnation

Under the Law of Reincarnation, if there is anything unresolved or incomplete at the end of a lifetime, your soul is allowed an opportunity to return in human form to resolve or complete it.
If you cheat someone in one lifetime, your soul will wish to make amends by returning to help that person in another life.
Where one person has consistently hurt another (eg. a husband harming his wife), they will wish to return together so that the soul of the perpetrator can repay.
If a parent dies leaving his children feeling angry, confused or misunderstood, under the Law of Reincarnation those spirits will choose to come back together to try to relate differently. Whole families often return at the same time in an effort to work things out. Communities who are in conflict or at war will come back to Earth together to see if their souls can find peace together instead of battle and conflict.
Often we reincarnate again and again into similar circumstances because of the soul’s desire to put the past to rest.
Once we are on the earthplane, in this material place of free-will and choice, it is all too easy to forget the ideals and perspective of the spiritual world. Once again we make the same mistakes and are trapped in the cycle of reincarnation.
Earth is a learning establishment in which our lessons are presented to us in the form of experiences. Once we die and leave behind the physical body, our soul’s ‘report card’ is scrutinized and reviewed with the help of our guides, angels and spiritual mentors, known as the Lords of Karma. We then decide which lesson we need to brush up on and which classes we need to redo in order to accomplish our goal of ascension.
Where we have done well, our soul learns new lessons in the following incarnation/s.
Souls will experience lives in every religion, have lives as peasants, merchants, soldiers, medics and artists – every conceivable life style and area they can learn from. These souls will incarnate again and again to perfect lessons and repay karma. These souls will experience all polarities, such as student/teacher, rich/poor, male/female, service/selfishness, betrayer/betrayed.
The Akashic Records are kept by the Lords of Karma. Good and bad are credits and debits. In future lifetimes we can call on our credit, but we must also re-pay our debts.
There are many reasons why a soul may wish to reincarnate.
Some may include:
• to put right past wrongs (to repay our debts)
• to experience and strengthen ourselves
• to learn more about our emotions, sexuality and other lessons exclusive to the earthplane
• to serve on this planet, to teach, to help, to be a ‘light’ to others.
Earth is a planet of free-will and choice. Every thought, word or deed eventually manifests into your life. Your mindsets and emotions build your physical body and provide you with opportunities to have different experiences.
Ultimately, there is a spiritual working-out of all things.
It is not up to us to judge what somebody else is doing or how they are handling the lessons of their incarnation. Just be aware that every single soul is on a journey over many lifetimes, and they are continuously learning on that journey.
The greatest way of helping another is to demonstrate by example that there is another way of living.

Akashic Records –
The majority of the world’s cultures, faiths and philosophers generally agree that the Akashic Records exist. The Hindus believe in a universal substance call ‘akasha’ – from which the natural elements of water, fire, earth and air were created.
The Akashic Records are perceived to be the collective memories and histories of every thought, physical and emotional vibration, sound, major event, minor incident and all movement in eternity. The Akashic Records are the entire history of everything that ever has been, and everything that ever will be. They could be looked upon as a ‘memory bank’ containing details about everything that happens in the Universe, and information about every spirit and the many lives they have lived

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Law of karma

Actually the law of karma is very simple and has been known for thousands of years. The law of Karma is known in Christian teachings, as well as in many other cultures. It says: Whatever you do to others – will be done to you, in this or any future incarnation of your soul. This law is so straightforward and logical, it sometimes is hard to believe, that some persons still think they may somehow get around it. If you knock your head against a wall, it is obvious – it may damage the wall and it may hurt your head. If you knock someone by physically fighting – you may cause harm, pain, injury to the person and the law of Karma requires you to experience the same pain. This is to have you learn to behave in a way that causes but pleasant experiences to others and yourself alike.
Whatever you do, you may attract persons around you, that have a same or similar Karma than you have. If you are of a physically fighting nature, you may attract such persons again and again. Until you start to become aware of your own behavior and start to be fed up with the result of your very own actions. Until you start to strive for a more peaceful environment. The only sure method of finding one is changing your very own behavior.
This law of karma applies for individuals as much as for families, groups, villages, cities, or even entire planets.
The energy of thoughtfulness, kindness and graciousness are considered to be ‘good karma’. When you send these energies out, they will be returned to you in kind.
Hate, anger and resentment are damaging energies. When you send out these negative energies, they too will return to you in some form.
as you give so you shall receive’, or ‘you reap what you sow’. Bad deeds and thoughts return to you, as do kind, thoughtful deeds. To the exact extent that you live these qualities, you will receive an equivalent back into your life, at some time. Karma is recorded and balanced. Loving thoughts, emotions, deeds and words are ‘credits’. Negative ones are ‘debits’. The Universe calls these up when we least expect it.
Your family is also your karma. Your soul chooses your family before you are born. Difficult family ties may be a consequence of unresolved feelings or situations in a past life. You choose that family this time around because your soul wanted another chance to resolve the problems. This offers you the lessons your soul needs to learn. By loving and empowering others we heal karmic relationships.
Mindsets that you bring into this life with you are also your karma. If you have a mindset that you are not good enough, the belief will inevitably draw into your life things and people that make you feel inferior or weak.
Positive beliefs create good karma in your life. Wonderful things then happen. You are responsible for your own mindset, so change your beliefs if they do not serve you in a positive manner.
Your health is your karma. Before you incarnated you chose your family, your life challenges and your mission. You also chose your body and your genetic predisposition. Your moment by moment choices of thoughts and emotions will affect your vitality and health. This is your karma.
The balance sheet of your karma is known as your ‘Akashic Records’, which is a recorded history of all of your lives and life experiences and lessons. Karma is carried forward from lifetime to lifetime. We may not experience the consequences of our actions until a subsequent lifetime. Because of this there is often no obvious and visible correlation between an action and its consequences.
The higher our vibration, the more quickly karma returns to us. Some are subjected to ‘instant karma’. If you feel that you never get away with anything, you may be experiencing instant karma. This means that whatever you give out comes back to you, instantly. It is a sign that you are becoming more evolved because your karmic balance sheet is being kept up to date. Your soul is no longer allowing you to accumulate debt.