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रत्न विज्ञानं

रत्न क्यों तथा कब पहनना चाहिए

विज्ञान और हम सब यह मानते हैं की सृष्टि तथा मानव शरीर पंच तत्वों के मिश्रण से बना है- अग्नि, पृथ्वी, वायु, आकाश एवं जल। विधिवत सृष्टि संचालन तथा मानव शरीर संचालन के लिए इन तत्वों का संतुलन परम आवश्यक है। इन तत्वों के संतुलित रहने पर जिस प्रकार सृष्टि प्रसन्न रहती है उसी प्रकार, मनुष्य प्रसन्न तथा स्वस्थ रहता है। इन्हीं तत्वों के असंतुलित होने पर जिस प्रकार ज्वार-भाटा और अन्य प्राकृतिक आपदाएं आती हैं उसी प्रकार मनुष्य रोगग्रस्त, चिड़चिड़ा, दुखों से पीड़ित एवं कांतिहीन हो जाता है।किसी भी एक तत्त्व की न्यूनता तथा अधिकता दोनों ही ख़राब है। और इन तत्वों को संतुलित करने का आधार है ऊर्जा, प्रकाश और रंग। रत्न भी इसी सिद्धांत पर काम करता है।

रत्न करता क्या है
रत्न खुद किसी प्रकाश अथवा ऊर्जा का श्रोत नहीं होता अपितु अपनी संरचना, बनावट, अपने रंग, स्वभाव के अनुसार विशेष प्रकार की ऊर्जा/कंपनशक्ति/चुम्बकीय शक्ति को खींचता है और और उसको अवशोषित (Absorb), परावर्तित (Reflect) अथवा प्रसारित (Transmit) करता है।

रत्न की चमक इसकी सतह से परावर्तित प्रकाश की मात्रा (Quantity) और गुणवत्ता (Quality) के कारण होती है। रत्न का रंग इस बात पर निर्भर करता है की उनसे किस wavelength का प्रकाश अवशोषित तथा परावर्तित किया है। विज्ञानं इसको चयनात्मक अवशोषण (Selective Absorption) कहता है।

रत्न अगर किसी ऐसी चीज़ से स्पर्श करे जो उर्जा का चालाक हो तो उर्जा/कंपनशक्ति/चुम्बकीय शक्ति/प्रकाश प्रसारित कर देता है। यही कारण है की ज्योतिषी कहते हैं की रत्न ऊँगली/शरीर से स्पर्श होना चाहिए।

वैसे तो इस ब्रह्माण्ड की प्रत्येक वस्तु ऊर्जा को अवशोषित/परावर्तित करता है। परन्तु रत्न जिस विशेष प्रकार की ऊर्जा को खींचता है वो है ग्रहों की ऊर्जा, सूर्य के प्रकाश में निहित ग्रहों की विशेष रश्मियाँ, ग्रह की चुम्बकीय शक्ति, ग्रहों की विशेष कम्पन शक्ति।

अब आप ये तो समझ गए की रत्न ग्रह से सम्बंधित ऊर्जा को बड़ा देता है परन्तु खुद रत्न में इतना दिमाग नहीं है की वो ऊर्जा आपको सकारात्मक प्रभाव देगी या नकारात्मक। यह आपको और आपके ज्योतिषी को पता लगाना होगा। अगर वो ग्रह आपकी कुंडली का अकारक/अनिष्ट ग्रह है तो नकारात्मक ऊर्जा बढ़ जायेगी और आपको विपरीत परिणाम ही मिलेंगे। अथवा अगर आपके शरीर में पहले से ही अग्नितत्व की अधिकता के कारण कोई रोग है और आपने अग्नितत्व का ही रत्न पहन लिया तो रोग और ज्यादा बढ़ सकता है।

किस ग्रह का रत्न आप पहन सकते हैं
सामान्यत: लग्न कुंडली के अनुसार योगकारक ग्रह (जो ग्रह केंद्र तथा त्रिकोण दोनों का स्वामी हो). कारक ग्रहों के (1, 5, 9 भाव स्वामी) रत्न पहने जा सकते हैं। परन्तु यह बहुत सामान्य नीयम है और इसका यह मतलब नहीं की अगर जरूरत न हो फिर भी योगकारक और कारक ग्रह का रत्न पहनना चाहिए।

रत्न कब और क्यों पहनना चाहिए
एक सच्चा ज्योतिषी रत्न पहनने की सलाह देता है अगर:

लग्न कुंडली के किसी कारक ग्रह का बल बहुत कम है। किसी भी ग्रह का बल ६ तरीके का होता है स्थान बल, दिग्बल, काल बल, चेष्टा बल, नैसर्गिक बल, द्रिक बल जिसको षड्बल कहते हैं। अगर षड्बल में ग्रह कमजोर है और न्यूनतम आवश्यकता से कम बल प्राप्त है तो यह तो निश्चित है की उसको बल देने की जरूरत है।
परन्तु षड्बल के साथ साथ यह भी देखना जरूरी है की ग्रह किस भाव में किस अन्य ग्रह के साथ बैठकर कैसा फल दे रहा है। मान लीजिये आपका कारक ग्रह मंगल अष्टम में बैठकर किसी अनिष्ट की सम्भावना बना रहा है और षड्बल में कमजोर है तो अगर आपने मंगल को और मजबूत कर दिया तो अनिष्ट होना निश्चित ही मानिए।
ग्रह अपनी महादशा/अन्तर्दशा में ज्यादा प्रभाव डालता है अतः अगर वो कारक ग्रह है तथा कमजोर है तो उसका रत्न पहनें। ग्रह गोचर के अनुसार भी रत्न पहना जा सकता है।

किस ग्रह का रत्न आपको नहीं पहनना चाहिए

सामान्यतः 3, 6, 8, 12 भाव के स्वामी ग्रहों के रत्न नहीं पहनने चाहिए जब तक की वो खुद लग्नेश/भाग्येश न हो।
अष्टमेश अगर लग्नेश न हो तो उसका रत्न कभी भी न पहनें (अगर किसी विशेष परिस्तिथि में जरूरत पड़े तो यह जांच लें की अष्टम भाव में उसकी मूल त्रिकोण राशि न पड़े)। और भी अन्य तरीके हैं ग्रहों की सकारात्मक उर्जा को बढ़ाने की।
ऐसे ग्रह का रत्न न पहनें जो लग्नेश का शत्रु हो।
बाधक, मारक, केन्द्राधिपत्य दोष से दूषित, मारक स्थान में गए ग्रह का रत्न पहनने से बचें।
अगर ऐसे ग्रह का रत्न पहनने की जरूरत पड़े जो 6, 8, 12 भाव में बैठा है तो अच्छा रहेगा साथ में उसी ग्रह का यंत्र जोड़ दें और गले में धारण करें।

रत्न पहनने का तरीका
अगर यह सुनिश्चित कर लिया है की आपको रत्न पहनना है तो वह रत्न किस उंगली में, किस धातु में, किस दिन, किस समय, किस ग्रह की होरा में, किस मंत्रोचारण के साथ पहनना है यह भी ज्योतिषी से जरूर पता कर लें। रत्न को पहनने से पहले इष्ट देव, ग्रह से सम्बंधित देवता का पूजन अनिवार्य है। मैं इस बारे में अलग से ब्लॉग पोस्ट लिखूंगा।

रत्नों के बारे में भ्रांतियां

अगर कोई भी मांगलिक हो तो मूंगा पहन ले
अगर गुस्सा आता है तो मोती पहन लो
अगर किसी की शादी नहीं हो रही तो पुखराज/ओपल/जरकिन पहन ले
अगर किसी के संतान नहीं तो उसकी पत्नी को पुखराज पहना दो
पन्ना धारण करने से परीक्षा में सफलता मिल जायेगी।
गुरु पुत्र, धन कारक ग्रह है अतः पुखराज कोई भी पहन सकता है
लग्न कुंडली में कोई भी ग्रह नीच का है तो उसका रत्न पहन लो
अगर राहु की महादशा चल रही है तो गोमेद पहन लो
जिस भी ग्रह की महादशा चल रही है उसका रत्न जरूर पहनना चाहिए
अगर ग्रह अस्त है तो उसका रत्न पहन लो चाहे षड्बल में उसको सर्वोच्च स्थान ही क्यों न प्राप्त हो।
रत्न ग्रह की शान्ति करता है।

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